धर्मनगरी मे दर-दर बिखरे पड़े पुरावशेष,जिन्हें सहेजने की जरूरत

चित्रकूट।प्राचीन इतिहास की कहानी बयां करने वाले अवशेष तो इस चित्रकूट जिले मे बहुत हैं लेकिन इनमें किसी की रुचि नहीं है। चाहे प्रशासनिक अमला हो या जनप्रतिनिधि। इतिहास’ को संजोने में सरकार की कोई रुचि नहीं है। अब इतिहास से सीख लेने की सरकार की न तो सोच और न ही दिलचस्पी दिख रखी है। जिसका ही परिणाम है कि यह अवशेष इधरउधर बिखरे पड़े हैं। जनपद मे मंदिरों के साथ कई ऐतिहासिक स्थलों और शैलचित्रों को संरक्षण की दरकार है। इन्हें सहेजने के दिशा मे कोई ठोस कदम कभी नहीं उठाए गए। जिसकी एक वजह यह भी है कि जिस विभाग कि जिम्मेदारी की जिम्मेदारी इन्हें पहचानने व सहेजने की है वह खुद के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। पाठा क्षेत्र मे कलाकृतियां व प्रतिमाओं की देखरेख न होने से विलुप्त होती जा रही हैं। जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में बिखरे पड़े अवशेषों को कैसे सहेजा जा सकता है यह सोचनीय पहलू हैं। मानिकपुर नगर से लगभग 15 किलोमीटर दूर जारोमाफी में स्थित काली माता मंदिर एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है। इसी तरह भरतकूप स्थित मंडपहा पहाड़ मे अर्ध्दध्वस्त मंदिर है। इसके आस-पास के क्षेत्रो में कई पुरातात्विक संपदा बिखरी पड़ी है। इसी तरह मऊ क्षेत्र का ऋषियन आश्रम,पुरातन कलाकृतियां, प्रतिमाएं, अभिलेख अपने अस्तित्व की गुहार लगा रहे हैं। दु:खद पहलू यह है कि उक्त आश्रमों मे प्रतिमाएं अभी भी खुले आसमान के नीचे ही रखी हुई है। ग्रामीणों द्वारा इसे व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया है लेकिन प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस पहल नही की गई है।

यहां की सौम्यता और हरियाली सहज ही मोह लेती मन

जिले में आदिवासी संस्कृति एवं पुरानी विभिन्न सभ्यताओं से जुड़ी तरह-तरह के अवशेष पुरावशेष, शैलचित्र, शिलालेख, भित्ती चित्र  आदि दुर्लभ वस्तुओं की बहुलता है। यहां की प्राकृतिक सौम्यता, हरियाली, ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल, लोक संस्कृति और कलात्मक आकर्षण बरबस मन को मोह लेते हैं।यहां पुरातन धरोहरों, शिलालेखों, लोककलाओं, भित्ती चित्रों, लोक संस्कृति, पाण्डुलिपियों को संग्रहालय में संरक्षित और संग्रहित करने की आवश्यकता है। इनके संग्रहण से ही भावी पीढ़ी अतीत की गौरवगाथा से परिचित हो पाएगी।

यहां बिखरी पड़ी हैं पुरातात्विक धरोहर

चित्रकूट जिले के पाठा अंचल में पुरातात्विक धरोहर बिखरी पड़ी हैं। यहां से कई बार पुरातात्विक बेशकीमती मूर्तियों की चोरी भी हो चुकी है। इसी तरह मंडपहा पहाड़ पर ढेर सारी पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं बिखरी हुई हैं।संरक्षण के अभाव में ये बहुमूल्य धरोहर नष्ट होते जा रहे हैं। पुरानी पांडुलिपियां भी असुरक्षि हैं। पाण्डुलिपियों को संग्रहित कर संग्रहालय में रखने से भावी पीढ़ी अपनी पुरानी पाण्डुलिपियों से परिचित हो पाएगी।

पुरातात्विक धरोहरों को सहेजने की जरुरत

वर्षों से पुरातात्विक विषयों पर शोध कर रहे एवं नए-नए जगह की तलाश करने वाले पुरातत्वप्रेमी अनुज हनुमत का कहना है कि क्षेत्र में पुरातात्विक धरोहरों का भंडार है। यहां कई सभ्यताओं की झलक व ऐतिहासिक चीजें देखने को मिलती हैं। कई जगह तो लोग पहुंच भी नहीं पाए हैं जहां पुराने शिलालेख, भित्तीचित्र सहित कई देवी-देवताओं की मूर्तियां पड़ी हुई हैं। इन्हें न सिर्फ तलाशने की जरुरत है बल्कि इन्हें सहेजने की भी आवश्यकता है। इन धरोहरों को सहेजने से भावी पीढ़ी को पुरातत्व एवं ऐतिहासिक चीजों के साथ विभिन्न सभ्यता, संस्कृति की जानकारी मिल सकेगी। चित्रकूट में विश्व स्तरीय संग्रहालय की स्थापना भी की जा सकती है।

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